रग-रग में राम: मेरी यात्रा, मेरा उत्तरदायित्व
रग-रग में राम
मेरी यात्रा, मेरा उत्तरदायित्व
डॉ. यतीन्द्र कटारिया ‘विद्यालंकार’ का आत्मकथ्य
मैं जब अपने जीवन की इस यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे मंच नहीं दिखते—मुझे वे चेहरे दिखते हैं, जिनमें अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने अस्तित्व की खोज अब भी जारी है।
मुंबई में मेरी कृति रग रग में राम का विमोचन मेरे लिए कोई साधारण साहित्यिक आयोजन नहीं था। एस. बी. चाव्हाण ऑडिटोरियम के उस मंच पर खड़े होकर मैंने महसूस किया कि यह केवल एक पुस्तक का उद्घाटन नहीं, बल्कि उस विचारधारा का उद्घोष है—जो मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ती है।
जब महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा की गरिमामयी उपस्थिति में यह कृति पाठकों के समक्ष आई, तो मेरे भीतर एक गहरा प्रश्न भी उठा—क्या मैं सच में उस उत्तरदायित्व को निभा पा रहा हूँ, जो समाज ने मुझे सौंपा है?
इस पुस्तक के पीछे कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक अनुभूति है—“राम” मेरे लिए केवल एक नाम नहीं, बल्कि जीवन की वह चेतना हैं, जो हर मनुष्य के भीतर प्रवाहित होती है। मेरा प्रयास केवल इतना रहा है कि उस चेतना को शब्दों में ढाल सकूँ, ताकि समाज अपने भीतर झाँक सके।
जब संध्या पोरछा, अजीत डोभालकर और डॉ. वैदेही तामण जैसे विविध क्षेत्रों के विद्वानों ने इस कृति को विमोचित किया, तो यह मेरे लिए संकेत था कि साहित्य सीमाओं में नहीं बंधता—वह कला, सिनेमा, शोध और समाज सभी का साझा आधार बन सकता है।
उस संध्या जब उषा मंगेशकर और हरिहरन की स्वर लहरियाँ वातावरण में गूंज रही थीं, और पूजा बेदी भारतीय जीवनशैली पर अपने विचार रख रही थीं—तब मुझे यह एहसास हुआ कि संस्कृति केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि जीवन के हर आयाम में जीवित है।
मैंने हमेशा यह माना है कि साहित्य केवल शब्दों का सृजन नहीं, बल्कि समाज के साथ संवाद है। इसी भाव के साथ जब मैंने आयकर भवन और एनटीपीसी व रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन के मंचों से हिंदी के संवर्धन पर बात की, तो मेरा उद्देश्य केवल भाषा का प्रचार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की भावना को जागृत करना था।
न्यूज मेकर्स अचीवर्स अवार्ड जैसे मंचों पर जब देशभर की विभूतियों के साथ खड़े होने का अवसर मिला, तो मैंने इसे उपलब्धि नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया—कि अब मेरे शब्दों को और अधिक सार्थक होना होगा।
मेरी आगामी कृतियाँ—भारत की विभाजन विभीषिका और सरदार पटेल तथा श्रीराम के समग्र स्वरूप पर आधारित श्रीराम सर्वस्व—दरअसल उसी शोधयात्रा का विस्तार हैं, जिसे मैं वर्षों से जी रहा हूँ।
मैं अपने जीवन को किसी सम्मान या समारोह की परिधि में नहीं बांधता। मेरे लिए हर मंच एक प्रयोगशाला है, हर श्रोता एक शोधकर्ता है, और हर शब्द एक संभावित परिवर्तन।
यदि मेरी यह यात्रा किसी एक व्यक्ति को भी यह सोचने पर विवश कर दे कि—
“साहित्य केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की प्रक्रिया है,”
तो मैं समझूँगा कि मेरी ‘रग-रग में राम’ की अनुभूति समाज तक पहुँच रही है।
यह आत्मकथ्य केवल मेरा नहीं—यह उस विचार का दस्तावेज़ है, जहाँ एक व्यक्ति अपने व्यक्तिगत अनुभवों को जनहित में रूपांतरित करता है। और यही कारण है कि यह केवल प्रेरणा नहीं, बल्कि शोध का विषय भी बन सकता है—कि कैसे एक साधारण पृष्ठभूमि से निकला व्यक्ति, भाषा और संस्कृति को आधार बनाकर वैश्विक संवाद का हिस्सा बनता है।
चित्रदीर्घा











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