गांव की मिट्टी से विश्व मंच तक डॉ. यतीन्द्र कटारिया ‘विद्यालंकार' का आत्मकथ्य’
“गांव की मिट्टी से विश्व मंच तक — मेरा आत्मकथ्य”
— डॉ. यतीन्द्र कटारिया ‘विद्यालंकार’
मैं मोहिउद्दीनपुर की उस साधारण पगडंडी से निकला हूँ, जहाँ सपने अक्सर सीमाओं में पलते हैं, पर मैंने उन्हें सीमाओं से बाहर जीने का साहस किया। मेरे लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रही, वह मेरी पहचान, मेरी संस्कृति और मेरी आत्मा का विस्तार बन गई।
जब मैंने हिंदी को अपने जीवन का केंद्र बनाया, तब यह केवल एक विषय नहीं था—यह एक संकल्प था। एक ऐसा संकल्प, जिसमें अपने गांव की खुशबू, अपने लोगों की आवाज़ और अपनी संस्कृति की गरिमा को विश्व पटल पर स्थापित करने का भाव निहित था।
मेरी यात्रा आसान नहीं रही। छोटे से गांव से निकलकर भारत के विभिन्न शहरों में अपनी बात रखना, फिर सीमाओं को पार कर दुनिया के अनेक देशों में हिंदी की सेवा करना—यह सब एक सतत तपस्या का परिणाम है। हर मंच पर खड़े होकर मैंने यही अनुभव किया कि मैं अकेला नहीं बोल रहा, मेरे साथ मेरा गांव, मेरा क्षेत्र और मेरी मातृभाषा बोल रही है।
हाल ही में दिल्ली और मुंबई में हुए मेरे सम्मान और व्याख्यान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं हैं; यह उस विश्वास की जीत है कि अगर उद्देश्य स्पष्ट हो, तो सीमाएँ स्वतः ही टूट जाती हैं। जब देश के रेल मंत्री ने मेरी सराहना की और महाराष्ट्र के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान जैसे व्यक्तित्वों ने सम्मानित किया, तब यह मेरे लिए प्रेरणा का क्षण था—न कि ठहरने का।
मेरी नौ पुस्तकें मेरे विचारों का प्रतिबिंब हैं, लेकिन मैं उन्हें अपनी उपलब्धि नहीं मानता। वे तो उन अनुभवों का दस्तावेज़ हैं, जो मैंने समाज, संस्कृति और मानवता के बीच जीते हुए संजोए हैं।
हस्तिनापुर साहित्य उत्सव में सहभागिता मेरे लिए एक विशेष अनुभव रहा, जहाँ देशभर से आए लगभग 2000 साहित्यकारों के बीच विचारों का महासंगम हुआ। उस मंच पर खड़े होकर मैंने महसूस किया कि साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और दिशा दोनों है।
अब जब मैं अमेरिका और जापान में अपने आगामी व्याख्यानों की तैयारी कर रहा हूँ, तो मेरे भीतर वही गांव का बालक जीवित है—जो मिट्टी की खुशबू में भविष्य के सपने देखता था।
मैं अपने जीवन को किसी उपलब्धि की सूची नहीं, बल्कि एक सतत यात्रा मानता हूँ—जहाँ हर कदम पर सीख है, हर अनुभव में संदेश है।
यदि मेरी यह यात्रा किसी एक युवा को भी यह विश्वास दिला सके कि “छोटा स्थान, बड़ी पहचान की बाधा नहीं है,” तो मैं अपने प्रयास को सार्थक मानूँगा।
मेरा विश्वास है—
“जब इरादे गांव की सादगी से जन्म लेते हैं और मेहनत उन्हें दिशा देती है, तब वे विश्व मंच पर भी अपनी गूंज छोड़ते हैं।”
यह आत्मकथ्य केवल मेरा नहीं, उन सभी का है जो सीमाओं से परे जाकर अपनी जड़ों को साथ लेकर चलने का साहस रखते हैं—और यही इसे शोध का विषय भी बनाता है।
चित्रदीर्घा
































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