डिजिटल साक्षरता - एक संकल्प, एक यात्रा, एक दायित्व
डिजिटल साक्षरता
एक संकल्प, एक यात्रा, एक दायित्व
आत्मकथ्य
(डॉ.) उपदेश वर्मा
सहायक आचार्य, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं नेशनल कोऑर्डिनेटर, नींव
मैं जब भी अपने शैक्षणिक जीवन और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता हूँ, तो मुझे हमेशा यह अनुभव होता है कि शिक्षा केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं हो सकती। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तब पूर्ण होता है, जब वह समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, जो अब तक उससे वंचित रहा है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में एक सहायक आचार्य के रूप में मेरी भूमिका मुझे ज्ञान के औपचारिक प्रसार का अवसर देती है, लेकिन मेरे अंतर्मन में हमेशा यह प्रश्न उठता रहा—क्या यह ज्ञान केवल शहरों और संसाधन-संपन्न वर्गों तक ही सीमित रह जाए? इसी प्रश्न ने मुझे “नींव” जैसी पहल से जोड़ने का मार्ग दिखाया।
“नींव” — जो कि IIT के पूर्व छात्रों द्वारा संचालित एक सामाजिक एवं शैक्षिक प्रयास है — मेरे लिए केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक विचार है। एक ऐसा विचार, जो यह मानता है कि यदि समाज को सशक्त बनाना है, तो उसकी नींव को मजबूत करना होगा। और यह नींव है—ग्रामीण और वंचित वर्ग के बच्चे।
इसी सोच के साथ हमने मेरठ के ग्राम छज्जूपुर, परतापुर स्थित डॉ. शशिप्रभा मेमोरियल पब्लिक स्कूल में डिजिटल साक्षरता अभियान की शुरुआत की। जब हमने इस पहल का आरंभ किया, तब हमारे सामने अनेक चुनौतियाँ थीं—संसाधनों की कमी, तकनीकी जागरूकता का अभाव, और कहीं-कहीं झिझक भी। लेकिन बच्चों की आँखों में सीखने की जो चमक थी, उसने हमें हर बाधा को पार करने की प्रेरणा दी।
तीन माह की इस यात्रा में मैंने बच्चों को केवल कंप्यूटर के बटन दबाते नहीं देखा, बल्कि उन्हें अपने आत्मविश्वास को जागृत करते हुए देखा। जब वे पहली बार MS Word में अपना नाम टाइप करते थे, तो वह केवल एक शब्द नहीं होता था—वह उनके आत्मविश्वास का पहला अक्षर होता था। जब वे MS Excel में गणनाएँ करते थे, तो वह केवल संख्याएँ नहीं होती थीं—वह उनके भविष्य की संभावनाओं का गणित होता था। और जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे विषय पर चर्चा करते थे, तो मुझे लगता था कि ये बच्चे केवल तकनीक नहीं सीख रहे, बल्कि वे भविष्य को समझने की क्षमता अर्जित कर रहे हैं।
परीक्षा के दिन जब मैंने उन बच्चों को देखा, तो मुझे यह विश्वास हुआ कि यह पहल अपने उद्देश्य की दिशा में सफल हो रही है। और जब उन्हें “तीन माह का कंप्यूटर कोर्स पूर्णता प्रमाण पत्र” प्रदान किया गया, तो उनके चेहरे पर जो गर्व और प्रसन्नता थी, वह मेरे लिए किसी भी उपलब्धि से कम नहीं थी।
मैंने उस दिन बच्चों से एक ही बात कही—“यह अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है।” डिजिटल साक्षरता केवल स्वयं तक सीमित रखने की वस्तु नहीं है; यह एक जिम्मेदारी है, जिसे आगे बढ़ाना होगा। मैंने उन्हें प्रेरित किया कि वे अपने गाँव के अन्य लोगों के लिए डिजिटल साक्षरता के दूत बनें।
मेरे लिए यह अनुभव केवल एक प्रोजेक्ट नहीं था, बल्कि एक आत्मिक संतोष का माध्यम था। यह देखना कि कैसे शिक्षा एक जीवन को बदल सकती है, कैसे एक छोटा-सा प्रयास एक बड़े परिवर्तन की नींव रख सकता है—यह मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक रहा।
मैं यह मानता हूँ कि आज के डिजिटल युग में तकनीकी ज्ञान केवल एक कौशल नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है। यदि हम अपने ग्रामीण और वंचित समाज को इस ज्ञान से जोड़ पाते हैं, तो हम केवल उन्हें सशक्त नहीं बना रहे होते, बल्कि हम देश के भविष्य को भी सुदृढ़ कर रहे होते हैं।
अंततः, मैं यही कहना चाहूँगा कि “नींव” की यह पहल एक सतत यात्रा है। यह केवल एक गाँव या एक स्कूल तक सीमित नहीं रहेगी। हमारा प्रयास रहेगा कि हम इस डिजिटल साक्षरता के दीप को एक-एक गाँव, एक-एक घर तक पहुँचाएँ—ताकि कोई भी बच्चा तकनीकी अज्ञानता के कारण अपने सपनों से वंचित न रह जाए।
यह मेरा कर्तव्य भी है, और मेरा संकल्प भी।
झलकियाँ
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







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