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Declining Priority

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Declining Priority How India’s Education Budget Has Been Quietly Eroded ? Education has long been described as the backbone of a nation’s development. In India, this idea is repeatedly invoked in speeches, policy documents, and vision statements. Yet, a closer look at budgetary data over the last decade and a half reveals a troubling contradiction: while rhetoric around education has intensified, its actual financial priority has steadily declined. The infographic titled “Declining Priority: Educational Budget Analysis” captures this reality with stark clarity. It tracks education expenditure as a percentage of the total Union Budget from 2009 to 2025, and the trend it shows is unmistakable — a sustained downward slide. The Numbers Tell a Clear Story In the early 2010s, education occupied a relatively stronger position in India’s Union Budget. Around 2011–12, education expenditure peaked at approximately 5.04% of the total budget. Even in 2014–15, the final year of the UPA-II governmen...

When Bloodlines Betray Trust : A Grim Reflection on Today’s Near Relations

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Preface Society rests on 5who shape values and act as the first moral safeguards. When ethics collapse within this inner circle, the impact extends beyond private life and seeps into public institutions, governance, and collective safety. The incident discussed in this article highlights the complex interaction between family loyalty and social responsibility, where silence can enable wrongdoing and truth can demand painful courage. It brings together the roles of family members, administrative systems, and society at large, urging reflection on how personal integrity within relationships is inseparable from the health of the wider social order. When Bloodlines Betray Trust A Grim Reflection on Today’s Near Relations The recent incident reported by The Indian Express (Lucknow, December 13), based on Manish Sahu’s report, is not just a case of identity theft or administrative failure—it is a disturbing mirror held up to the fragile state of trust within near relations today. When decept...

नवागत शिक्षकों/शोधार्थियों का मार्गदर्शन

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भूमिका यह संक्षिप्त प्रयास उन सभी नवागतों और शोधकर्ताओं के लिए समर्पित है जो किसी भी क्षेत्र में अपने ज्ञान, उत्साह और समर्पण के साथ नया रास्ता बनाना चाहते हैं। हर आरंभ में संशय होता है, हर यात्रा में चुनौतियाँ होती हैं, लेकिन जो जिज्ञासा से सीखता है और धैर्य से चलता है, वह एक दिन दिशा बन जाता है।  यहां दिए गए विचार, अनुभव और मार्गदर्शन केवल एक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत हैं। यदि यह सामग्री आपके भीतर एक नई चेतना, सोच या योजना को जन्म देती है — तो यह प्रयास सार्थक है। आप किसी भी क्षेत्र से हों — शिक्षा, विज्ञान, सामाजिक सेवा, कला या तकनीक — यदि आप मार्गदर्शन चाहते हैं, तो हमसे संवाद अवश्य करें। आपके विचारों को दिशा देना ही हमारा उद्देश्य है। सहायता हेतु सदैव उपलब्ध — आशावादी सोच के साथ, नई शुरुआत की ओर... नई पीढ़ी के शिक्षकों के लिए मार्गदर्शन मास्टर हंसराज तंवर      (राजस्थान में जिला स्तरीय शिक्षक सम्मान प्राप्त) महात्मा गांधी विद्यालय, बनेठा (टोंक, राजस्थान)  प्रिय नवागत शिक्षक साथियो!  शिक्षण केवल एक पेशा नहीं, अपितु यह एक धर्म है – आत्मा से...

नियोजित व अनियोजित कल्पनाशीलता को समझें

अनियोजित कल्पनाशीलता से कल निर्मित इमारतें आज खंडहर हो गयीं तथा वर्तमान में किये जा रहे ऐसे प्रयास भी व्यर्थ हो जाएंगे तो यह है विमर्श का विषय कि ऐसा क्या किया जाए जिसको पीढियों तक विस्मृत ना कर पाएं। "अनियोजित कल्पनाशीलता से कल निर्मित इमारतें आज खंडहर हो गयीं तथा वर्तमान में किये जा रहे ऐसे प्रयास भी व्यर्थ हो जाएंगे।" यह पंक्ति हमें उस गूढ़ सच्चाई की ओर ले जाती है, जिसे अक्सर हम अनदेखा कर देते हैं – किसी रचना की दीर्घायु केवल उसकी भव्यता से नहीं, अपितु उसकी दूरदर्शिता और उद्देश्यपरकता से तय होती है। हमारे चारों ओर ऐसी अनेक रचनाएँ हैं – भौतिक और मानसिक – जो कभी अत्यंत नवाचार और उत्साह का प्रतीक थीं, परंतु आज केवल स्मृति शेष हैं। ये वे संरचनाएँ हैं जिन्हें योजना के बिना केवल कल्पना और तत्कालीन उत्साह के बल पर खड़ा किया गया। परंतु समय ने उन्हें प्रश्नचिह्न बना दिया। आज के युग में भी, जब तकनीक और संसाधनों की कोई कमी नहीं, हम फिर उसी राह पर अग्रसर हैं। स्वार्थपरक सोच, तात्कालिक प्रसिद्धि की लालसा और गहराई से विचार न करने की प्रवृत्ति हमें वही पुरानी भूलें दोहराने पर विवश कर रही...

विचार योग्य विषय

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भूमिका कल तक जब तक हम क्या हर कोई समाज में अपनी भूमिका समझता था और बुद्धिमानी इतनी कि समाज में निषिद्ध श्रेणी के विषयों को दरकिनार कर दिया जाता था। समय बदला और वर्जनाएं टूटीं तथा इंटरनेट के आगमन से निषिद्ध श्रेणी के समस्त विषयों पर खुले आम बात होने लगीं। तो लगा कि आज के समय में हमको सर्वाधिक सोचने समझने की जरूरत है। विवरण समाज में कुछ विषय ऐसे होते हैं जो संवेदनशील या बाद विवाद के लिए निषिद्ध माने जाते हैं। इन विषयों पर चर्चा करना विवादास्पद हो या ना हो लेकिन सामाजिक दृष्टि से आपत्तिजनक माना जाता रहा है और कई बार लोग इन मुद्दों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करते। तो फिर इस स्थिति में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि सामाजिक दृष्टि से उचित कदम स्थिति को नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाए जाएं ताकि चर्चा का सही दिशा में मार्गदर्शन हो सके और समाज में किसी भी प्रकार की नकारात्मकता या अनैतिकता की उत्पत्ति की संभावना से बचा जा सके।  समाज में चर्चा के विषय यदि अनैतिक प्रकृति के बहुतायत से होने पर भी यदि उदासीनता बनी रहे और कोई कार्रवाई नहीं की जाए, तो दो प्रमुख समस्याएं सामान्यतः उत्पन्न होती हैं।...