संदेश

अप्रैल, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सब स्पष्ट करता श्री हंसराज हंस का आत्मकथ्य

सब स्पष्ट करता श्री हंसराज हंस का आत्मकथ्य भूमिका सब स्पष्ट करता हंसराज 'हंस' का यह आत्मकथ्य शोधार्थियों के लिए एक सरल और प्रेरक उदाहरण है। इसमें एक वरिष्ठ शिक्षक के उस संकल्प की झलक मिलती है, जिसमें उन्होंने हिंदी को और आसान तथा सबके लिए सुलभ बनाने का प्रयास किया। मात्रारहित हिंदी पुस्तक लिखने का उनका विचार भाषा को सरल रूप में प्रस्तुत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस आत्मकथ्य में उनका आत्मविश्वास, मेहनत और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण साफ दिखाई देता है। उनका यह प्रयास यह संदेश देता है कि सच्चा संकल्प वही होता है, जो नए रास्ते बनाता है और दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनता है। आत्मकथ्य मैं हंसराज हंस, अपने इस छोटे से लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रयास के बारे में आपसे मन की बात साझा करना चाहता हूँ। जीवन में संगीत ने मुझे बहुत कुछ दिया, परंतु जब मैं बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा, विशेषकर भाषा सीखने की जटिलताओं को देखता हूँ, तो मन में एक नई जिम्मेदारी का भाव जागृत होता है। इसी भावना के साथ मैंने एक ऐसी पुस्तक के निर्माण का संकल्प लिया, जो तीन वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए हिंदी भा...

संस्तुति

चित्र
पाती योजना विश्वविद्यालयों के लिए विषय : विविध विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों को शहीद धनसिंह कोतवाल पर शोध हेतु प्रेरित करने के संबंध में माननीय कुलपति महोदय/महोदया, सादर नमस्कार। ज्ञान, शोध और नवविचार की परंपरा को सशक्त बनाने में विश्वविद्यालयों की भूमिका सदैव अग्रणी रही है। इसी क्रम में, हम आपका ध्यान भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक महानायक, शहीद धनसिंह कोतवाल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं, जिनका योगदान विशेषकर 1857 की क्रांति में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, किंतु अभी भी व्यापक अकादमिक शोध का अपेक्षित विस्तार नहीं हो सका है। धनसिंह कोतवाल केवल एक ऐतिहासिक चरित्र नहीं, बल्कि वे भारतीय स्वाभिमान, नेतृत्व, सामाजिक चेतना और बलिदान के प्रतीक हैं। उनके जीवन और कार्यों पर गहन एवं बहुआयामी शोध न केवल इतिहास को समृद्ध करेगा, बल्कि वर्तमान और भावी पीढ़ियों को भी प्रेरणा प्रदान करेगा। अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि आपके विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों एवं विभागों में शोधार्थियों को निम्नलिखित विषयों पर शोध कार्य हेतु प्रेरित किया जाए— * 1857 की क्रांति में धनसिंह कोतवाल क...

यतीन्द्र जी का आत्मकथ्य: एक दृष्टि, जो जनहित में चित्र बन गई

चित्र
आत्मकथ्य एक दृष्टि, जो जनहित में चित्र बन गई मैं, यतीन्द्र कटारिया, शब्दों से अधिक दृश्य पर विश्वास करता हूँ—क्योंकि दृश्य सीधे हृदय में उतरते हैं और स्मृति में स्थायी हो जाते हैं। जब मुझे जननायक जयपाल सिंह ‘बाबूजी’ और मंगरौला की पुण्यधरा को केंद्र में रखकर इस ऐतिहासिक क्षण को विजुअलाइज़ करने का अवसर मिला, तो यह मेरे लिए केवल एक रचनात्मक कार्य नहीं था—यह एक जिम्मेदारी थी, एक साधना थी। मेरे सामने केवल एक टेक्स्ट नहीं था, बल्कि एक विरासत थी—सादगी, सेवा और समर्पण की विरासत। बाबूजी का जीवन मेरे लिए किसी चरित्र का चित्रण नहीं, बल्कि एक जीवित दर्शन था। मैंने महसूस किया कि उन्हें शब्दों में बाँधना पर्याप्त नहीं होगा; उन्हें दृश्य में उतारना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ केवल पढ़ें नहीं, बल्कि देखें, महसूस करें और प्रेरित हों। जब मैंने मंगरौला की धरती पर बहती ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ की आधुनिक धारा को बाबूजी के सपनों से जोड़ा, तो यह मेरे लिए अतीत और वर्तमान का संगम बन गया। एक ओर वह सादगी से भरा संघर्षपूर्ण जीवन, और दूसरी ओर विकास की यह तीव्र गति—दोनों के बीच एक अदृश्य सेतु बनाना ही मेरे विज़न का कें...

सृजन का स्वप्न…

चित्र
सृजन का स्वप्न…  भूमिका सृष्टि भर में शोध औपचारिक तथा अनौपचारिक तरीके से चलते रहते हैं। कुछ ऐसे ही डॉ राकेश छोकर भी विविधता के साथ अपने शोधों में संलग्न रहते हैं। उनके द्वारा सृजित एक स्वप्न ने जब आकार लिया और उसका चतुर्थ संस्करण उलझन सुलझन इकाई की नजरों में आया तो इकाई को लगा कि अब ही वह उपयुक्त समय है जब इस सृजन के स्वप्न से जनमानस को भी अवगत कराया जाए और टीम उलझन सुलझन ने आज उस सबको आपके सम्मुख रख दिया है। एक मौका जिसे डॉ. राकेश छोकर ने साकार होते देखा नई दिल्ली के हिंदी भवन में जब सृजनाभिनंदनम् – चतुर्थ का आयोजन अपने चरम पर था, तब यह केवल एक कार्यक्रम नहीं था—यह एक दृष्टि का जीवंत रूप था। वह दृष्टि, जिसे डॉ. राकेश छोकर ने वर्षों पहले देखा था—एक ऐसा मंच, जहाँ शब्द, कला, साधना और अभिव्यक्ति एक साथ मिलकर समाज के बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास का मार्ग प्रशस्त करें। डॉ. छोकर की कल्पना में सृजनाभिनंदनम् केवल सम्मान समारोह नहीं था, बल्कि यह एक सृजन-यज्ञ था—जहाँ हर विधा के साधक अपनी साधना का अर्पण करें और एक-दूसरे के प्रयासों को नमन करते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा लें। इस चतुर्थ संस्करण...

डिजिटल साक्षरता - एक संकल्प, एक यात्रा, एक दायित्व

चित्र
डिजिटल साक्षरता एक संकल्प, एक यात्रा, एक दायित्व आत्मकथ्य    (डॉ.) उपदेश वर्मा सहायक आचार्य, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं नेशनल कोऑर्डिनेटर, नींव मैं जब भी अपने शैक्षणिक जीवन और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता हूँ, तो मुझे हमेशा यह अनुभव होता है कि शिक्षा केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं हो सकती। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तब पूर्ण होता है, जब वह समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, जो अब तक उससे वंचित रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक सहायक आचार्य के रूप में मेरी भूमिका मुझे ज्ञान के औपचारिक प्रसार का अवसर देती है, लेकिन मेरे अंतर्मन में हमेशा यह प्रश्न उठता रहा—क्या यह ज्ञान केवल शहरों और संसाधन-संपन्न वर्गों तक ही सीमित रह जाए? इसी प्रश्न ने मुझे “नींव” जैसी पहल से जोड़ने का मार्ग दिखाया। “नींव” — जो कि IIT के पूर्व छात्रों द्वारा संचालित एक सामाजिक एवं शैक्षिक प्रयास है — मेरे लिए केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक विचार है। एक ऐसा विचार, जो यह मानता है कि यदि समाज को सशक्त बनाना है, तो उसकी नींव को मजबूत करना होगा। और यह नींव है—ग्रामीण और वंचित वर्ग के बच्चे। इसी ...