नियोजित व अनियोजित कल्पनाशीलता को समझें
अनियोजित कल्पनाशीलता से कल निर्मित इमारतें आज खंडहर हो गयीं तथा वर्तमान में किये जा रहे ऐसे प्रयास भी व्यर्थ हो जाएंगे तो यह है विमर्श का विषय कि ऐसा क्या किया जाए जिसको पीढियों तक विस्मृत ना कर पाएं। "अनियोजित कल्पनाशीलता से कल निर्मित इमारतें आज खंडहर हो गयीं तथा वर्तमान में किये जा रहे ऐसे प्रयास भी व्यर्थ हो जाएंगे।" यह पंक्ति हमें उस गूढ़ सच्चाई की ओर ले जाती है, जिसे अक्सर हम अनदेखा कर देते हैं – किसी रचना की दीर्घायु केवल उसकी भव्यता से नहीं, अपितु उसकी दूरदर्शिता और उद्देश्यपरकता से तय होती है। हमारे चारों ओर ऐसी अनेक रचनाएँ हैं – भौतिक और मानसिक – जो कभी अत्यंत नवाचार और उत्साह का प्रतीक थीं, परंतु आज केवल स्मृति शेष हैं। ये वे संरचनाएँ हैं जिन्हें योजना के बिना केवल कल्पना और तत्कालीन उत्साह के बल पर खड़ा किया गया। परंतु समय ने उन्हें प्रश्नचिह्न बना दिया। आज के युग में भी, जब तकनीक और संसाधनों की कोई कमी नहीं, हम फिर उसी राह पर अग्रसर हैं। स्वार्थपरक सोच, तात्कालिक प्रसिद्धि की लालसा और गहराई से विचार न करने की प्रवृत्ति हमें वही पुरानी भूलें दोहराने पर विवश कर रही...