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एक यात्रा केवल मुंबई तक नहीं, जो भीतर तक पूरी हुई

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एक यात्रा केवल मुंबई तक नहीं, जो भीतर तक पूरी हुई  डॉ. यतीन्द्र कटारिया ‘विद्यालंकार’ की दृष्टि से जब मैं छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा के उस विशाल परिसर में खड़ा था और ऊपर चमकते अक्षरों में ONE WORLD देख रहा था, तब मुझे लगा—यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि मेरी पूरी यात्रा का सार है। मोहिउद्दीनपुर की पगडंडियों से निकलकर मुंबई के इस वैश्विक द्वार तक पहुँचना… यह दूरी केवल किलोमीटरों में नहीं मापी जा सकती। यह दूरी संघर्ष, विश्वास, और अपनी भाषा के प्रति अटूट समर्पण से तय हुई है। मुंबई में मेरी कृति रग रग में राम का भव्य विमोचन हुआ—लेकिन उस क्षण में मैंने किसी उपलब्धि का नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी के पूर्ण होने का अनुभव किया। जब मंच पर सम्मान मिला, जब शब्दों को सराहा गया—तो भीतर से एक आवाज आई,  “यह अंत नहीं, एक नए अध्याय की शुरुआत है।” एयरपोर्ट के हर कोने में, हर दृश्य में मुझे भारत की विविधता और संस्कृति की झलक दिखाई दी—कहीं DELHI Vibes की झांकी, कहीं आधुनिकता की चमक, तो कहीं परंपरा की गहराई। मैंने महसूस किया कि मेरा लेखन भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए—जो आधुनिकता और परंपरा...

रग-रग में राम: मेरी यात्रा, मेरा उत्तरदायित्व

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रग-रग में राम मेरी यात्रा, मेरा उत्तरदायित्व   डॉ. यतीन्द्र कटारिया ‘विद्यालंकार’ का आत्मकथ्य मैं जब अपने जीवन की इस यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे मंच नहीं दिखते—मुझे वे चेहरे दिखते हैं, जिनमें अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने अस्तित्व की खोज अब भी जारी है। मुंबई में मेरी कृति रग रग में राम का विमोचन मेरे लिए कोई साधारण साहित्यिक आयोजन नहीं था। एस. बी. चाव्हाण ऑडिटोरियम के उस मंच पर खड़े होकर मैंने महसूस किया कि यह केवल एक पुस्तक का उद्घाटन नहीं, बल्कि उस विचारधारा का उद्घोष है—जो मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ती है। जब महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा की गरिमामयी उपस्थिति में यह कृति पाठकों के समक्ष आई, तो मेरे भीतर एक गहरा प्रश्न भी उठा—क्या मैं सच में उस उत्तरदायित्व को निभा पा रहा हूँ, जो समाज ने मुझे सौंपा है? इस पुस्तक के पीछे कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक अनुभूति है—“राम” मेरे लिए केवल एक नाम नहीं, बल्कि जीवन की वह चेतना हैं, जो हर मनुष्य के भीतर प्रवाहित होती है। मेरा प्रयास केवल इतना रहा है कि उस चेतना को शब्दों में ढाल सकूँ, ताकि समाज अपने भीतर झाँक सके। जब स...

उस दिन मुझे अपना दादा होना समझ में आया…

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जब अपना दादा होना समझ में आया… महिला दिवस का दिन था। घर में सामान्य-सी हलचल थी, लेकिन मेरे भीतर एक अलग ही शांति थी। तभी कुक्कू मेरे पास आई—आंखों में चमक और मन में एक आग्रह लेकर। उसने कहा कि वह अपनी दादी और मम्मा को पुष्पगुच्छ देना चाहती है। उसकी मासूम जिद में प्रेम था, पर साथ ही एक आदत भी—जो उसने दुनिया से देखी थी। मैंने उसे गौर से देखा। वह केवल फूल नहीं देना चाहती थी, वह अपनी भावनाओं को सबसे सुंदर तरीके से व्यक्त करना चाहती थी। उसी क्षण मुझे लगा कि यह केवल एक उपहार चुनने का विषय नहीं है, यह एक अवसर है—उसके मन में एक छोटी-सी समझ बोने का। मैंने उसे बहुत सरल शब्दों में कहा— “बेटा, ये फूल कुछ ही देर में मुरझा जाएंगे… और फिर इन्हें फेंक दिया जाएगा। क्या अच्छा नहीं होगा कि तुम कुछ ऐसा दो, जिसकी खुशी थोड़ी देर और टिके?” वह चुप हो गई। उसकी आंखों में सवाल थे, लेकिन विरोध नहीं। मैंने मुस्कुराकर कहा— “अगर तुम चॉकलेट दोगी, तो उसकी मिठास बाद में भी बनी रहेगी… जैसे तुम्हारा प्यार।” उसने मेरी बात को सुना… समझा… और बिना किसी बहस के अपने निर्णय को बदल लिया। उस क्षण मुझे लगा कि बच्चे वास्तव में बहुत सह...

गांव की मिट्टी से विश्व मंच तक डॉ. यतीन्द्र कटारिया ‘विद्यालंकार' का आत्मकथ्य’

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  “गांव की मिट्टी से विश्व मंच तक — मेरा आत्मकथ्य” — डॉ. यतीन्द्र कटारिया ‘विद्यालंकार’ मैं मोहिउद्दीनपुर की उस साधारण पगडंडी से निकला हूँ, जहाँ सपने अक्सर सीमाओं में पलते हैं, पर मैंने उन्हें सीमाओं से बाहर जीने का साहस किया। मेरे लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रही, वह मेरी पहचान, मेरी संस्कृति और मेरी आत्मा का विस्तार बन गई। जब मैंने हिंदी को अपने जीवन का केंद्र बनाया, तब यह केवल एक विषय नहीं था—यह एक संकल्प था। एक ऐसा संकल्प, जिसमें अपने गांव की खुशबू, अपने लोगों की आवाज़ और अपनी संस्कृति की गरिमा को विश्व पटल पर स्थापित करने का भाव निहित था। मेरी यात्रा आसान नहीं रही। छोटे से गांव से निकलकर भारत के विभिन्न शहरों में अपनी बात रखना, फिर सीमाओं को पार कर दुनिया के अनेक देशों में हिंदी की सेवा करना—यह सब एक सतत तपस्या का परिणाम है। हर मंच पर खड़े होकर मैंने यही अनुभव किया कि मैं अकेला नहीं बोल रहा, मेरे साथ मेरा गांव, मेरा क्षेत्र और मेरी मातृभाषा बोल रही है। हाल ही में दिल्ली और मुंबई में हुए मेरे सम्मान और व्याख्यान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं हैं; यह उस विश्वास की जीत ह...