एक यात्रा केवल मुंबई तक नहीं, जो भीतर तक पूरी हुई
एक यात्रा केवल मुंबई तक नहीं, जो भीतर तक पूरी हुई डॉ. यतीन्द्र कटारिया ‘विद्यालंकार’ की दृष्टि से जब मैं छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा के उस विशाल परिसर में खड़ा था और ऊपर चमकते अक्षरों में ONE WORLD देख रहा था, तब मुझे लगा—यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि मेरी पूरी यात्रा का सार है। मोहिउद्दीनपुर की पगडंडियों से निकलकर मुंबई के इस वैश्विक द्वार तक पहुँचना… यह दूरी केवल किलोमीटरों में नहीं मापी जा सकती। यह दूरी संघर्ष, विश्वास, और अपनी भाषा के प्रति अटूट समर्पण से तय हुई है। मुंबई में मेरी कृति रग रग में राम का भव्य विमोचन हुआ—लेकिन उस क्षण में मैंने किसी उपलब्धि का नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी के पूर्ण होने का अनुभव किया। जब मंच पर सम्मान मिला, जब शब्दों को सराहा गया—तो भीतर से एक आवाज आई, “यह अंत नहीं, एक नए अध्याय की शुरुआत है।” एयरपोर्ट के हर कोने में, हर दृश्य में मुझे भारत की विविधता और संस्कृति की झलक दिखाई दी—कहीं DELHI Vibes की झांकी, कहीं आधुनिकता की चमक, तो कहीं परंपरा की गहराई। मैंने महसूस किया कि मेरा लेखन भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए—जो आधुनिकता और परंपरा...